rehmat.re रहमत (जुलाहा) की शायरी

फैलाते रहे हैं लोग मज़हबों से सीख कर इतनी गंदगी वर्ना.

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फैलाते रहे हैं लोग मज़हबों से सीख कर इतनी गंदगी वर्ना.
सियासत तो उधर भी साफ़ है, सियासत इधर भी साफ़ है.
– रहमत (जुलाहा)

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Rehmat Ullah - रहमत (जुलाहा)