rehmat.re रहमत (जुलाहा) की शायरी

नहीं फ़िक्र कि क़ब्र तराश भूखे ही मर जाएँगे.

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नहीं फ़िक्र कि क़ब्र तराश भूखे ही मर जाएँगे.
कुछ मरे हुए लोग आज भी ज़िंदा घर जाएँगे.
– रहमत (जुलाहा)

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Rehmat Ullah - रहमत (जुलाहा)