rehmat.re रहमत (जुलाहा) की शायरी

मिटाने को मेरी लिखावट, तू कितने ‘अज़ाब करता है.

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मिटाने को मेरी लिखावट, तू कितने ‘अज़ाब करता है.
एक खुली किताब से सियाही का भी हिसाब करता है.
– रहमत (जुलाहा)

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Rehmat Ullah - रहमत (जुलाहा)